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शिविर लग रहे, मरीज नहीं मिल रहे

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कोटा। बूंदी जिले के बरड़ में दो साल से चिकित्सा विभाग हर माह दो शिविर लगा रहा है। इन शिविरों में रोगी भी आ रहे हैं। कई टीबी रोगी पाए जा रहे हैं और उन्हें इलाज भी दिया जा रहा है। इतनी बड़ी संख्या में रोगी आने के बावजूद किसी को सिलिकोसिस की पहचान नहीं हो सकी है।

असल में प्रक्रिया के तहत इन शिविरों में आने वाले किसी रोगी को यदि सिलिकोसिस की आशंका हो तो संबंधित डॉक्टर उस रोगी को कोटा मेडिकल कॉलेज के न्यूमिकोनोसिस बोर्ड के पास रैफर करते हैं, लेकिन बीते साल में इन शिविरों से एक या दो रोगी ही रैफर किए गए हैं।

जबकि इस अवधि में करीब बीस शिविर लगाए जा चुके और 500 से ज्यादा रोगियों का उपचार भी किया जा चुका। यहां से रैफर नहीं किए जाने के चलते खुद रोगी ही कोटा आकर बोर्ड के समक्ष पेश हो रहे हैं और इनमें से कई को सिलिकोसिस के लक्षण भी पाए गए हैं। हालांकि इन्हें सिलिकोसिस का प्रमाणपत्र नहीं मिल पाया है। विस्तार से देखें

सौजन्य से: राजस्थान पत्रिका

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सांसद बिरला ने संसद में उठाया सिलिकोसिस का मुद्दा

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कोटा-बूंदी से लोक सभा सांसद श्री ओम बिरला ने राजस्थान खानों में कार्यरत सिलिकोसिस बीमारी से पीडि़त मजदूरों को अविलम्ब विशेषज्ञ सुविधायुक्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का मुद्दा संसद में शून्य काल के दौरान उठाया। उन्होंने कहा कि राजस्थान में लगभग 32 हजार खदानें हैं जिनमें 20 लाख से ज्यादा मजदूर काम करते हैं। खनन मजदूरों को विशेष रूप से सांस सम्बंधित बीमारियां होती हैं जिसका मुख्य कारण खानों में काम करने के दौरान सिलिका एवं अन्य अयस्कों के महीन कण फेफडों में चले जाते हैं और जाकर जम जाते हैं, जो धीरे धीरे पहले टीबी के रूप में फिर सिलिकोसिस का रूप धारण कर लेते हैं जो कि लाइलाज बीमारी है।

सांसद बिरला ने कहा है कि अकेले राजस्थान में खान उद्योग में लगे श्रमिक औसतन 40 वर्ष की आयु के बाद खराब स्वास्थ्य के चलते पलंग पकडने को मजबूर हो जाते हैं और शेष जीवन किसी न किसी सहारे काटने को विवश होना पड़ता है। सिलिकोसिस बीमारी की जांच के लिए आवश्यक जांचें जैसे लंग बायोप्सी, कैट स्कैनिंग, फ्लोनरि फंक्शन टैस्ट आदि की सुविधा चुनिंदा केन्द्रों पर उपलब्ध होने के कारण गरीब श्रमिक वहां तक पहुंचने में असमर्थ रहता हैं और समय पर अपना इलाज नहीं करवा पाता है। कमोबेश यही हाल संपूर्ण देश में खनन क्षेत्रों में काम करने वाले खान श्रमिकों का है।

श्री बिरला ने खान श्रमिकों को खनन क्षेत्रों में काम करने के लिए सुरक्षित वातावरण व खनन संबंधित आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने के लिए खान मालिकों को पाबंद करने की कार्ययोजना बनाए जाने की मांग की।

सौजन्य से: प्रेसनोट डॉट इन

जांच रिपोर्ट गलत या जांचकर्ता!

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जोधपुर मे के. एन. चेस्ट अस्पताल का एक मामला सामने आया है। जिसमे अस्पताल के डॉक्टर भी कन्फूज है कि मरीज को सिलिकोसिस की बीमारी है या फिर कुछ और बीमारी है। पहले तो डाक्टरों ने चेक किया तो पाया कि सिलिकोसिस नाम की बीमारी है। परंतु कुछ महीने बाद दोबारा बोर्ड की टीम ने चेक किया तो उसे सिलिकोसिस का मरीज मानने से इंकार कर दिया। अब मरीज को ये समझ नही आ रहा है कि वह करे तो क्या करे। ऎसे में सवाल यह उठता है कि जांच रिपोर्ट गलत है या फिर जांच करने वाले चिकित्सक। यह घटना अस्पताल व बोर्ड की जांच प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगा रही है। अब जिम्मेदारों का कहना है कि मामले की पूरी जांच के बाद ही हकीकत पता चल सकती है।उधर मरीज ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा है। दूसरे खान मजदूरों जो कि टीबी से ग्रस्त हैं वह भी बोल रहे है कि हमारी भी सिलिकोसिस की जांच होनी चाहिए। क्योकि सिलिकोसिस लाइलाज बीमारी है।  विस्तार से जानने के लिए क्लिक करें।

सौजन्य से: राजस्थान पत्रिका

अब तक सिलिकोसिस से छह मजदूरों की मौत, कई मौत के कगार पर

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तिल-तिल मरने को मजबूर है मजदूर

पत्थर खदानों मे जीवन भर काम करने वाले मजदूरों के दम पर खदान संचालक मालामाल हुए और गरीब मजदूर लाइलाज बीमारी से मरने को मजबूर है। ज़िले मे सिलिकोसिस से ग्रस्त अब तक छह मजदूरों की मौत हो चुकी है। और प्रशासन द्वारा आज तक कोई प्रभावी कदम नही उठाया गया है। इससे बीमार हर दिन अपने को मौत के करीब जाते देखने के बाद भी कुछ नही कर पा रहा है।

गौरतलब है कि कुछ साल पहले ही सामाजिक संगठन की पहल से ज़िले के कुछ खनन मजदूरों का परीक्षण कराया गया तो इस बीमारी के बारे मे पता चला कि पन्ना मे सिलिकोसिस से पीड़ित मजदूर बड़ी संख्या मे है। बताया जाता है कि ज़िले मे खनन मजदूरों को सिल्का डस्ट के कारण यह बीमारी होती है। और धीरे-धीरे काम करने बंद कर देते है। जिससे मजदूर की मौत लगभग तय हो जाती है।

सिलिकोसिस मजदूरों का परीक्षण करने वाली सामाजिक संस्था पत्थर खदान मजदूर संघ के अध्यक्ष युसुफ बेग ने बताया कि ज़िला प्रशासन ने कभी भी इन मजदूरों की सुध नहीं ली। विस्तार से जानने के लिए क्लिक करें।

Death of 8 workers trapped in fire should be wake-up call for PH—labor group

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By Kristine Angeli Sabillo
MANILA, Philippines – It’s not the first time that workers were killed in a fire after being trapped in a padlocked building. And it might happen again if the government doesn’t move fast, a labor safety organization said.

The Institute for Occupational Health and Safety for Development (Iohsad) claimed that the employer of the eight women who died of suffocation after their warehouse was engulfed in flames last May 30 should be held accountable for violating his workers’ right to safe workplaces.

The employer, a Chinese businessman named Juanito Go, denied accusations that he padlocked the workers in the second floor room of a warehouse along P. Samonte Street, Barangay (village) 47 in Pasay City.

But Iohsaid pointed out that the lack of a fire escape was enough evidence of poor working conditions.

“Reports said that the workers who survived the tragedy escaped through a narrow hole in the building. This is a clear violation of Rule 1943.03 of the Philippine Occupational
Health and Standards (OHSS) that outlines the need to have at least 2 exits in every floor and basement capable of clearing the work area in five minutes,” the group said in a statement.
Iohsad Executive Director Noel Colina said the “tragedy confirms our country’s recent inclusion in the International Trade Union Confederation (ITUC) report as one of the worst countries to work in.”

The ITUC’s 2014 Global Rights Index, released two weeks ago, gave the Philippines a rate of “5,” joining countries like India, Saudi Arabia, Cambodia and other countries where there is “no guarantee of rights.”

“Countries with the rating of 5 are the worst countries in the world to work in. While the legislation may spell out certain rights workers have effectively no access to these rights and are therefore exposed to autocratic regimes and unfair labor practices,” ITUC explained.

“More and more workers are forced to work in unsafe and inhumane conditions. In the case of the eight workers, they had to endure working and staying in a padlocked warehouse that eventually caused their precious lives,” Colina said.
He pointed out that in May 9, 2012, 18 female workers of Novo Jeans and Shirts Department Store in Butuan City also died after being trapped in a burning building.

“We reiterate our call to the government to criminalize occupational health and safety violations to protect the workers and make companies liable for work-related deaths,” Colina said.

Courtesy: Inquirer.net

Healthcare body worried over risisng silicosis cases

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JAMSHEDPUR: With over 44 silicosis deaths in the last five years and continuous rise in the number of affected patients, the situation has turned rather grim in Musabani block of the East Singhbhum district.

Many believe that the indifferent attitude of the government is primarily responsible for the unchecked growth of silicosis patients in the area. “Had the government been serious about the matter, they would have implemented the state action plan for prevention and mitigation of silicosis,” said Samit Kumar Carr, general secretary of the Occupational Safety and Health Association of Jharkhand (OSHAJ).

The death of 55-year-old Salai Hansda of Tetabadia village in Musabani early this week apparently prompted the OSHAJ activist to up his ante against the state government. Referring to a telephonic conversation with a top official in the labour department over the death of Hansda, Karr said, “He called me up to discuss the issue of silicosis-affected workers not responding to the medical investigation process. I retorted by saying that people have become non-responsive because of the fake investigation process of the department.”

Proposing to set up an independent committee of experts to investigate the matter, OSHAJ demanded that the government declared compensation packages for people, who were diagnosed with the medical condition in 2005 and subsequently in 2012.

Residents of Kendadih, Tiringa and Tetabadia, among dozen-odd villages of the block, have alleged that two privately run silica factories are largely responsible for the spread of silica dust in the area.

“We will take up the matter before the members of the National Human Rights Organization (NHRC) during the regional review meeting of five eastern states in the city in July,” said the villagers on Friday. NHRC, on behalf of the poor villagers, has intervened into the matter and asked the state government to set its record straight as far as government’s effort to curb silicosis in the state is concerned.

When approached, an official in the state labour department informed that fresh medical check-up of silica-affected patients was underway at Musabani.

Courtesy: The Times of India

मजदूरों के लिए स्वस्थ्य शिविर संपन्न

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पन्ना ज़िले के सुदूर जंगल मे स्थित ग्राम बिलदवार ग्राम पंचायत कर्णा और हड़ा ग्राम पंचायत जनपद पवई मे जहां पत्थर खदानों मे काम करने वाले मजदूरों के लिए पत्थर खदान मजदूर संघ, श्रम शक्ति महिला सेवा संस्थान और वन विभाग के संयुक्त प्रयास से स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का आयोजन 26 एवं 27 मई 2014 को लगाया गया था। जिसमे 180 मजदूरों को स्वास्थ्य परीक्षण कर दवाएं बितरित की गयी। इस गाँव के सभी आदिवासी मजदूर पठार खदानों मे कम करते है। और इस गाँव मे ज़्यादातर मजदूरों को टी॰ वी॰ से ग्रसित पाया गया है। साथ ही परीक्षण करने वाले डॉ॰ अमित मिश्रा एम॰ ओ॰ मोहन्द्रा का कहना है कि इन मजदूरों को सिलिकोसिस होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।  विस्तार से देखे

मजदूरों और उनके परिवार वालों का स्वास्थ्य परीक्षण

दुर्गम पठारी गाँव मे लगाया शिविर

दुर्गम पठारी गाँव मे लगाया शिविर

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