1515

सौर ऊर्जा की कहानी 15वीं शताब्दी से पूर्व लियोनार्डो दा विन्सी के उन चित्रों से शुरू होती, जो दर्शाते हैं कि वो सौर ऊर्जा के उपयोग की तकनीक खोज रहे थे। 1515 में लियोनार्डो ने एक ऐसे मिरर का स्केच बनाया था, जिससे सौर ऊर्जा का इस्तेमाल पानी गर्म करने के लिए किया जा सके।

1767
सूर्य की रोशनी को सौर ऊर्जा में रूपांतरित करने की तकनीक अभी ईजाद नहीं हुई थी। 1767 में पहली बार सोलर एनर्जी कलेक्टर विकसित करने के लिए स्विस वैज्ञानिक हॉरेस डे सॉसे को खूब ख्याति मिली। इस सोलर एनर्जी कलेक्टर को हॉट बॉक्स कहा गया।

1830
फ्रेंच भौतिक शास्त्री एडमंड बैक्वेरल ने 1830 में सूर्य की रोशनी को ऊर्जा में रूपांतरित करने के बारे में बताया। बाद में ब्रिटिश एस्ट्रोनॉमर जॉन हर्शेल ने दक्षिण अफ्रीका में अपने अभियान के दौरान सॉसे की खोज पर आधारित एक हॉट बॉक्स का इस्तेमाल खाना बनाने के लिए किया।

1860
फ्रेंच गणितज्ञ ऑगस्टे मॉशु के प्रयासों के कारण 1860 तक सोलर एनर्जी के महत्व को गंभीरता से समझा जाने लगा था। मॉशु को उनके काम के लिए आर्थिक रूप से शाही मदद भी मिली थी। इसी फंड की वजह से वो सोलर एनर्जी से चलने वाली पहली मोटर बना सके थे।

1870
ब्रिटिश अधिकारी विलियम एडम्स ने 1870 में भाप इंजिन को पावर देने के लिए सूर्य से एनर्जी रूपांतरित करने के लिए मिरर का उपयोग किया। एडम्स की इस खोज का आज भी इस्तेमाल किया जाता है।

1883
चार्ल्स फ्रिट्ज को पहली बार सोलर एनर्जी से बिजली बनाने के लिए जाना जाता है। 1883 में पहली बार फ्रिट्ज ने ही सोलर सेल ईजाद किया था। इसके बाद फ्रेंच इंजीनियर चार्ल्स टेलियर ने अपने घर में सोलर पावर्ड हॉट वाटर सिस्टम लगाकर सौर ऊर्जा की उपयोगिता को साबित कर दिखाया।
47 दिन में मरुस्‍थलों से इतनी सोलर एनर्जी मिल सकती है, जो ऊर्जा के प्रमाणित जीवाश्म भंडार के बराबर होगी।

दुनिया के महान वैज्ञानिकों ने सदियों पहले सोलर एनर्जी की उपयोगिता को पहचान लिया था। यह बात अलग है कि हम आज भी उन तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। जबकि सौर ऊर्जा बिजली की जरूरतों को पूरा करने का सस्ता और सुलभ साधन बन सकती है।

पहला कमर्शियल सीएसपी प्लांट स्पेन में सन् 2007 में शुरू हुआ था। सोलर पावर प्लांट्स की संख्या लगातार बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सूर्य की गर्मी दुनिया को रोशन करने का एक बड़ा जरिया बन सकती है।

क्या है सीएसपी

संकेंद्रित सोलर पावर (Concentrated Solar Power) सिस्टम ऊष्मा एवं बिजली पैदा करते हैं। सैकड़ों मिरर की मदद से सूर्य की रोशनी को 400 से 1000 डिग्री सेल्सियस के तापमान तक संकेंद्रित किया जाता है।

एक वर्ग किमी में लगा सीएसपी
एक वर्ग किमी में लगे सीएसपी से एक साल तक 100 से 130 GWh सोलर पावर उत्पादन की जा सकती है। अनुमान है कि संकेंद्रित सोलर पावर 2030 तक दुनिया में बिजली की मांग का 7 प्रतिशत तक पूरा कर सकती है। और 2050 तक सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़कर 45 प्रतिशत होने का अनुमान है।

संकेंद्रित सोलर पावर (सीएसपी), क्या ये कर सकती है दुनिया को रोशन

सौर ऊर्जा को नमस्कार!
कोयला, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस के ऊर्जा उत्पादन के लिए हो रहे निरंतर दोहन से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है, जिससे धरती का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता जा रहा है। लेकिन आज विश्व की अधिकाधिक ऊर्जा जरूरतें इन्हीं पारंपरिक स्रोतों से पूरी होती हैं। ऊर्जा के ये सभी स्रोत अगले तीन-चार दशकों में समाप्त हो जाएंगे। ऐसे में मानव की ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी होंगी? यह एक बड़ा प्रश्न है। अनुमान है कि 2030-40 तक दुनिया की ऊर्जा जरूरतें आज की तुलना में 50 से 60 फीसदी तक बढ़ जाएंगी। ऐसे में अभी से ऊर्जा के वैकल्पिक अक्षय स्रोतों के उपयोग को बढ़ाना जरूरी है। ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति का एक मुख्य स्रोत सौर ऊर्जा भी है। सौर ऊर्जा उत्पादन के लिहाज से दुनिया के अधिकांश देशों की अपेक्षा भारत की स्थिति बेहद अनुकूल है क्योंकि यहां वर्ष के अधिकतर महीनों में सूर्य का तापमान अधिक तीव्रता के साथ उपलब्ध रहता है। लेकिन भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी महज 0.8 प्रतिशत है। आज सौर ऊर्जा का सर्वाधिक उपयोग विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करके किया जा रहा है। इसके लिए फोटोवोल्टेइक सेल की जिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, वह जरूरत के लिहाज से बेहद महंगी है। इसलिए इस तकनीक के सहारे अधिक सौर ऊर्जा का उत्पादन करना घाटे का ही सौदा लगता है। इसलिए ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए सौर ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ानी होगी और इसके लिए सस्ती तकनीक विकसित करने की जरूरत है।

ऑयल 2.1% न्यूक्लियर 0.5%

भारत में ऊर्जा उत्पादन

0.3% उत्तरी अफ्रीका का भूभाग सौर ऊर्जा से यूरोपियन यूनियन की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है। सही नीतियों और सोलर पावर को प्रोत्साहन देकर देश की कुल मांग का 20 प्रतिशत बिजली उत्पादन संभव।

भारत का 70 प्रतिशत क्षेत्र सोलर पावर के लिए उपयुक्त।

गुजरात के पाटन जिले में स्थित सोलर पार्क एशिया का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट है।
धरती को हर सेकंड मिलने वाली सोलर एनर्जी 100 वॉट के 4 ट्रिलियन लाइट बल्ब के बराबर होती है। एक वर्ग मील के दायरे में मिलने वाली सौर ऊर्जा 4 मिलियन बैरल ऑयल के बराबर होती है। इसलिए सौर ऊर्जा की क्षमता का आकलन कल्पना से परे है।

कम होगी निर्भरता
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक ऊर्जा के उत्पादन के लिए सूर्य की रोशनी के उपयोग से डीजल एवं कोयले के आयात पर भारत की निर्भरता कम हो सकती है। इससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा को भी सुनिश्चित किया जा सकेगा। सोलर सेक्टर में बढ़ोत्तरी से क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी बढ़ती है तो 2020 तक जीडीपी पर प्रति यूनिट उत्सर्जन भी 20-25 प्रतिशत तक कम हो सकता है।

कैसी तकनीक
एनर्जी को कैप्चर करने, उसे रूपांतरित करने और वितरित करने के तरीकों के आधार पर सोलर एनर्जी को दो हिस्सों एक्टिव सोलर एवं पैसिव सोलर में बांटा जा सकता है। एक्टिव सोलर तकनीक में एनर्जी को काम मे लाने के लिए फोटोवोल्टेइक पैनल्स और सोलर थर्मल कलेक्टर्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तकनीक का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए ज्यादा हो रहा है। पैसिव सोलर तकनीक में बिल्डिंग्स का ढांचा, खिड़कियों और फ्लोर्स को कुछ इस तरह डिजाइन किया जाता है, ताकि सर्दियों में सोलर एनर्जी को ऊष्मा के रूप में एकत्रित किया जा सके और गर्मी के मौसम में ऊष्मा बाहर निकल सके। इसमें इलेक्ट्रिकल डिवाइसेज की जरूरत नहीं होती।

सौजन्य से: अमर उजाला ब्यूरो

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