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Arrests at Malaysian Rare Earths Refinery Protests

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Locals and activists fear the refinery, operated by an Australian company, will generate radioactive waste.

An Australia-based environmental activist faces the possibility of a two-year prison sentence, in Malaysia, after being arrested while protesting against the world’s largest rare earth refinery.

Natalie Lowrey, who was born in New Zealand and lives in Sydney, was demonstrating with a one thousand-strong throng, at the Lynas Advanced Materials Plant (LAMP) in Kuantan, Malaysia, when she was detained and imprisoned, along with 15 other protestors who have since been released. Lowrey remains in detention at the Kuantan Police Station.

Tully McIntyre, a campaigner who works with Lowrey and is currently in Malaysia, told The Diplomat that authorities were not being clear about whether charges have been laid but her colleague is being held under two laws, one relating to unlawful assembly and the other pertaining to violation of an immigration permit.

The refinery — run by Australian company Lynas Corporation Ltd  — began processing rare earth ore, mined at Mount Weld in the desert of Western Australia, and shipped to the port of Kuantan, in 2012. The project has been hampered by a diverse coalition of campaign groups that is creating hurdles, with the aim of having the plant closed down, including launching legal action to see the company’s temporary operating license revoked. That bid was unsuccessful but the rare earth venture continues to galvanize a groundswell of grass roots opposition. Read more

Courtesy: The Diplomat

सोलर एनेर्जी कब, क्या और कैसे

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1515

सौर ऊर्जा की कहानी 15वीं शताब्दी से पूर्व लियोनार्डो दा विन्सी के उन चित्रों से शुरू होती, जो दर्शाते हैं कि वो सौर ऊर्जा के उपयोग की तकनीक खोज रहे थे। 1515 में लियोनार्डो ने एक ऐसे मिरर का स्केच बनाया था, जिससे सौर ऊर्जा का इस्तेमाल पानी गर्म करने के लिए किया जा सके।

1767
सूर्य की रोशनी को सौर ऊर्जा में रूपांतरित करने की तकनीक अभी ईजाद नहीं हुई थी। 1767 में पहली बार सोलर एनर्जी कलेक्टर विकसित करने के लिए स्विस वैज्ञानिक हॉरेस डे सॉसे को खूब ख्याति मिली। इस सोलर एनर्जी कलेक्टर को हॉट बॉक्स कहा गया।

1830
फ्रेंच भौतिक शास्त्री एडमंड बैक्वेरल ने 1830 में सूर्य की रोशनी को ऊर्जा में रूपांतरित करने के बारे में बताया। बाद में ब्रिटिश एस्ट्रोनॉमर जॉन हर्शेल ने दक्षिण अफ्रीका में अपने अभियान के दौरान सॉसे की खोज पर आधारित एक हॉट बॉक्स का इस्तेमाल खाना बनाने के लिए किया।

1860
फ्रेंच गणितज्ञ ऑगस्टे मॉशु के प्रयासों के कारण 1860 तक सोलर एनर्जी के महत्व को गंभीरता से समझा जाने लगा था। मॉशु को उनके काम के लिए आर्थिक रूप से शाही मदद भी मिली थी। इसी फंड की वजह से वो सोलर एनर्जी से चलने वाली पहली मोटर बना सके थे।

1870
ब्रिटिश अधिकारी विलियम एडम्स ने 1870 में भाप इंजिन को पावर देने के लिए सूर्य से एनर्जी रूपांतरित करने के लिए मिरर का उपयोग किया। एडम्स की इस खोज का आज भी इस्तेमाल किया जाता है।

1883
चार्ल्स फ्रिट्ज को पहली बार सोलर एनर्जी से बिजली बनाने के लिए जाना जाता है। 1883 में पहली बार फ्रिट्ज ने ही सोलर सेल ईजाद किया था। इसके बाद फ्रेंच इंजीनियर चार्ल्स टेलियर ने अपने घर में सोलर पावर्ड हॉट वाटर सिस्टम लगाकर सौर ऊर्जा की उपयोगिता को साबित कर दिखाया।
47 दिन में मरुस्‍थलों से इतनी सोलर एनर्जी मिल सकती है, जो ऊर्जा के प्रमाणित जीवाश्म भंडार के बराबर होगी।

दुनिया के महान वैज्ञानिकों ने सदियों पहले सोलर एनर्जी की उपयोगिता को पहचान लिया था। यह बात अलग है कि हम आज भी उन तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। जबकि सौर ऊर्जा बिजली की जरूरतों को पूरा करने का सस्ता और सुलभ साधन बन सकती है।

पहला कमर्शियल सीएसपी प्लांट स्पेन में सन् 2007 में शुरू हुआ था। सोलर पावर प्लांट्स की संख्या लगातार बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सूर्य की गर्मी दुनिया को रोशन करने का एक बड़ा जरिया बन सकती है।

क्या है सीएसपी

संकेंद्रित सोलर पावर (Concentrated Solar Power) सिस्टम ऊष्मा एवं बिजली पैदा करते हैं। सैकड़ों मिरर की मदद से सूर्य की रोशनी को 400 से 1000 डिग्री सेल्सियस के तापमान तक संकेंद्रित किया जाता है।

एक वर्ग किमी में लगा सीएसपी
एक वर्ग किमी में लगे सीएसपी से एक साल तक 100 से 130 GWh सोलर पावर उत्पादन की जा सकती है। अनुमान है कि संकेंद्रित सोलर पावर 2030 तक दुनिया में बिजली की मांग का 7 प्रतिशत तक पूरा कर सकती है। और 2050 तक सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़कर 45 प्रतिशत होने का अनुमान है।

संकेंद्रित सोलर पावर (सीएसपी), क्या ये कर सकती है दुनिया को रोशन

सौर ऊर्जा को नमस्कार!
कोयला, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस के ऊर्जा उत्पादन के लिए हो रहे निरंतर दोहन से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है, जिससे धरती का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता जा रहा है। लेकिन आज विश्व की अधिकाधिक ऊर्जा जरूरतें इन्हीं पारंपरिक स्रोतों से पूरी होती हैं। ऊर्जा के ये सभी स्रोत अगले तीन-चार दशकों में समाप्त हो जाएंगे। ऐसे में मानव की ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी होंगी? यह एक बड़ा प्रश्न है। अनुमान है कि 2030-40 तक दुनिया की ऊर्जा जरूरतें आज की तुलना में 50 से 60 फीसदी तक बढ़ जाएंगी। ऐसे में अभी से ऊर्जा के वैकल्पिक अक्षय स्रोतों के उपयोग को बढ़ाना जरूरी है। ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति का एक मुख्य स्रोत सौर ऊर्जा भी है। सौर ऊर्जा उत्पादन के लिहाज से दुनिया के अधिकांश देशों की अपेक्षा भारत की स्थिति बेहद अनुकूल है क्योंकि यहां वर्ष के अधिकतर महीनों में सूर्य का तापमान अधिक तीव्रता के साथ उपलब्ध रहता है। लेकिन भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी महज 0.8 प्रतिशत है। आज सौर ऊर्जा का सर्वाधिक उपयोग विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करके किया जा रहा है। इसके लिए फोटोवोल्टेइक सेल की जिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, वह जरूरत के लिहाज से बेहद महंगी है। इसलिए इस तकनीक के सहारे अधिक सौर ऊर्जा का उत्पादन करना घाटे का ही सौदा लगता है। इसलिए ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए सौर ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ानी होगी और इसके लिए सस्ती तकनीक विकसित करने की जरूरत है।

ऑयल 2.1% न्यूक्लियर 0.5%

भारत में ऊर्जा उत्पादन

0.3% उत्तरी अफ्रीका का भूभाग सौर ऊर्जा से यूरोपियन यूनियन की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है। सही नीतियों और सोलर पावर को प्रोत्साहन देकर देश की कुल मांग का 20 प्रतिशत बिजली उत्पादन संभव।

भारत का 70 प्रतिशत क्षेत्र सोलर पावर के लिए उपयुक्त।

गुजरात के पाटन जिले में स्थित सोलर पार्क एशिया का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट है।
धरती को हर सेकंड मिलने वाली सोलर एनर्जी 100 वॉट के 4 ट्रिलियन लाइट बल्ब के बराबर होती है। एक वर्ग मील के दायरे में मिलने वाली सौर ऊर्जा 4 मिलियन बैरल ऑयल के बराबर होती है। इसलिए सौर ऊर्जा की क्षमता का आकलन कल्पना से परे है।

कम होगी निर्भरता
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक ऊर्जा के उत्पादन के लिए सूर्य की रोशनी के उपयोग से डीजल एवं कोयले के आयात पर भारत की निर्भरता कम हो सकती है। इससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा को भी सुनिश्चित किया जा सकेगा। सोलर सेक्टर में बढ़ोत्तरी से क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी बढ़ती है तो 2020 तक जीडीपी पर प्रति यूनिट उत्सर्जन भी 20-25 प्रतिशत तक कम हो सकता है।

कैसी तकनीक
एनर्जी को कैप्चर करने, उसे रूपांतरित करने और वितरित करने के तरीकों के आधार पर सोलर एनर्जी को दो हिस्सों एक्टिव सोलर एवं पैसिव सोलर में बांटा जा सकता है। एक्टिव सोलर तकनीक में एनर्जी को काम मे लाने के लिए फोटोवोल्टेइक पैनल्स और सोलर थर्मल कलेक्टर्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तकनीक का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए ज्यादा हो रहा है। पैसिव सोलर तकनीक में बिल्डिंग्स का ढांचा, खिड़कियों और फ्लोर्स को कुछ इस तरह डिजाइन किया जाता है, ताकि सर्दियों में सोलर एनर्जी को ऊष्मा के रूप में एकत्रित किया जा सके और गर्मी के मौसम में ऊष्मा बाहर निकल सके। इसमें इलेक्ट्रिकल डिवाइसेज की जरूरत नहीं होती।

सौजन्य से: अमर उजाला ब्यूरो

माफिया पर प्रशासन की मेहरबानी, 15 लाख से ज्यादा का ‘सफेद सोना’ लूट गए खनन माफिया

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रुड़की। पुलिस-प्रशासन की मेहरबानी के कारण खनन माफिया लाखों रुपये की खनन सामग्री लूट गए। ग्रामीणों के मुताबिक, चिल्लावाली नदी में शनिवार रात से शुरू हुए खनन में तीन जेसीबी मशीनें और 30 से अधिक ट्रैक्टर ट्राली लगाई गई थी। एक जेसीबी एक घंटे में कम से कम दस ट्रैक्टर ट्रालियों में खनन सामग्री भर देती है। ऐसे में तीन जेसीबी एक घंटे में 30 ट्रैक्टर ट्राली खनन करेंगी। इस हिसाब से 24 घंटे में जेसीबी मशीनों ने 720 ट्राली खनन किया।

स्टोन क्रशर के भाव के मुताबिक एक ट्राली खनन की कीमत करीब 2200 रुपये हैं, 720 ट्राली के हिसाब से यह कीमत 15 लाख 84 हजार रुपये है। अब माफिया इतनी कीमत की खनन सामग्री तो लूट ही ले गए। साथ ही एक ट्राली पर 500 रुपये के राजस्व के हिसाब से राज्य सरकार को तीन लाख 60 हजार की रायल्टी का भी चूना लग गया। More

खनन का खेल, 21 जेसीबी पकड़ीं

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पथरी/श्यामपुर। गंगा और इसकी सहायक नदियों में अवैध खनन के विरोध में एंटी माइनिंग टीम ने पथरी और श्यामपुर क्षेत्र में छापेमारी कर 21 जेसीबी, पौकलेन और दो ट्रैक्टर-ट्रालियां पकड़ी। इन पर करीब 22 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। जबकि प्रशासन ने भोगपुर में एक स्टोन क्रशर का काम बंद करवा दिया है।

शुक्रवार दोपहर एंटी माइनिंग टीम ने पथरी क्षेत्र के फेरुपुर, बिशनपुर कुंडी और रानीमाजरा में छापेमारी की। टीम को देखकर कई चालक ट्रैक्टर-ट्राली लेकर भाग गए। जबकि कुछ जेसीबी और पौकलेन छोड़कर भाग निकले। इसके बाद टीम ने श्यामपुर क्षेत्र में छापेमारी की। दोनों क्षेत्रों में गंगा और अन्य बरसाती नदियों में जगह-जगह अवैध खनन होते पाया गया। टीम के सीईओ संजय गुंज्याल ने बताया कि शाम तक 23 वाहन पकड़े गए हैं। प्रत्येक जेसीबी और पौकलेन से न्यूनतम एक लाख रुपये का जुर्माना वसूला जाएगा। उन्हाेंने बताया कि कई जगहों पर पौकलेन और जेसीबी छिपाने की सूचना भी मिली है। टीम जंगलों में भी कांबिंग कर रही है। दूसरी ओर शुक्रवार को एसडीएम बीर सिंह बुद्धियाल ने भोगपुर पहुंचकर गणेश स्टोन क्रशर की जांच पड़ताल की। एसडीएम ने बताया कि ग्रामीणों की ओर से क्रशर को लेकर लगातार शिकायतें की जा रही थी। फिलहाल क्रशर पर काम बंद करा दिया है। शनिवार को रिपोर्ट तैयार कर आगे की कार्रवाई की जाएगी। More

सफाई के नाम पर खनन – जेसीबी से दिन-रात खोदी जा रही रिस्पना नदी

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देहरादून। सफाई की आड़ में रिस्पना नदी में खुलेआम अवैध खनन किया जा रहा है। ठेकेदार के कारिंदे जेसीबी लगाकर नदी से रेत और पत्थर निकाल कर ट्रकों एवं डंपरों में ढो रहे हैं। नदी में जेसीबी से खनन से कई फीट तक गहरे गड्ढे हो गए हैं। लोग आशंका जता रहे हैं कि बारिश में पानी उफनाया तो नदी के दोनों छोर के पुश्ते टिक नहीं पाएंगे। सफाई के नाम पर यह खेल कहीं पर रात में तो कहीं दिनदहाड़े खेला जा रहा है। सब कुछ जानने के बावजूद प्रशासन और सिंचाई विभाग के अधिकारी चुप हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार सफाई के आड़ में खनन करा रही है। मेयर विनोद चमोली भी इसे खनन का खेल बता रहे हैं।

मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद हरीश रावत ने शहर की नदियों की सफाई की बात कही थी। इसके लिए जिला प्रशासन और एमडीडीए को जिम्मेदारी सौंपी थी। कहा था कि दो माह में नदियां साफ हो जानी चाहिए। इसके बाद नदियों में सफाई का अभियान चला जो दो-चार दिन में दम तोड़ गया। पिछले कुछ दिनों से नदियों की सफाई चल रही है। लेकिन इसकी आड़ में खनन हो रहा है। मंगलवार को अमर उजाला टीम ने रिस्पना का निरीक्षण किया तो पूरी नदी गंदगी से पटी मिली। जाखन से रिस्पना नगर तक पूरा हो चुके सफाई प्रोेजेक्ट में केवल खनन होता दिखा। मंगलवार को रिस्पनानगर तक काम पूरा होने का दावा किया गया। लेकिन रिस्पनानगर से ऊपर की नदी उतनी ही गंदी मिली, जितनी की नीचे की ओर थी। मौके पर चार से पांच फीट के गहरे गड्ढे जरूर मिले। इससे स्थानीय लोग खासे नाराज हैं। पिछले दिनों नई बस्ती बलवीर रोड क्षेत्र में लोगों के विरोध के बाद ठेकेदार ने खनन रोक दिया, लेकिन विधानसभा से आगे खनन जारी है। विस्तार से देखें।

डाकपत्थर बैराज में हो रहा अवैध खनन – लॉट बंद होने पर भी धड़ल्ले से चल रहा खनन, पुल से बेरोकटोक गुजर रहे खनन भरे वाहन

हरिद्वार मे धोबीघाट पर खनन की अनुमति

सौजन्य से: अमर उजाला ब्यूरो

अब तक सिलिकोसिस से छह मजदूरों की मौत, कई मौत के कगार पर

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तिल-तिल मरने को मजबूर है मजदूर

पत्थर खदानों मे जीवन भर काम करने वाले मजदूरों के दम पर खदान संचालक मालामाल हुए और गरीब मजदूर लाइलाज बीमारी से मरने को मजबूर है। ज़िले मे सिलिकोसिस से ग्रस्त अब तक छह मजदूरों की मौत हो चुकी है। और प्रशासन द्वारा आज तक कोई प्रभावी कदम नही उठाया गया है। इससे बीमार हर दिन अपने को मौत के करीब जाते देखने के बाद भी कुछ नही कर पा रहा है।

गौरतलब है कि कुछ साल पहले ही सामाजिक संगठन की पहल से ज़िले के कुछ खनन मजदूरों का परीक्षण कराया गया तो इस बीमारी के बारे मे पता चला कि पन्ना मे सिलिकोसिस से पीड़ित मजदूर बड़ी संख्या मे है। बताया जाता है कि ज़िले मे खनन मजदूरों को सिल्का डस्ट के कारण यह बीमारी होती है। और धीरे-धीरे काम करने बंद कर देते है। जिससे मजदूर की मौत लगभग तय हो जाती है।

सिलिकोसिस मजदूरों का परीक्षण करने वाली सामाजिक संस्था पत्थर खदान मजदूर संघ के अध्यक्ष युसुफ बेग ने बताया कि ज़िला प्रशासन ने कभी भी इन मजदूरों की सुध नहीं ली। विस्तार से जानने के लिए क्लिक करें।

करनी थी सफाई, कर दी खुदाई

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देहरादून। मुख्यमंत्री हरीश रावत के आदेश पर शुरू हुई नदियों की सफाई की आड़ में ठेकेदार जमकर अवैध खनन कर रहे हैं। नदियों का कचरा साफ करने के बजाए जहां रेत-बजरी अधिक होती है वहां सात-आठ फुट गहराई तक खोदकर उपखनिज निकाल रहे हैं। रिस्पना नदी में पुश्ते के करीब तक खनन करने के चक्कर में शनिवार को नई बस्ती के लोगों ने ठेकेदार का विरोध किया तो मामले का खुलासा हुआ। खुदाई से रोकने पर ठेकेदार के कर्मचारियों ने लोगों पर जेसीबी चढ़ाने की धमकी भी दी।

क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि ठेकेदार कचरा तो नदी में ही छोड़ दे रहा है और रेत-बजरी का खनन कर रहा है। पुश्ते के नजदीक रेत-बजरी अधिक है तो उसे खोदा जा रहा है। खनन रात में किया जाता है ताकि लोगों को पता न चले। आरोप है कि पुश्ता के किनारे गड्ढा खोदने से बरसाती पानी पुश्ते को बहा ले जाएगा। क्षेत्रीय विधायक राजकुमार ने भी ठेकेदार को नदी में खनन नहीं करने के लिए मना किया था लेकिन वह नहीं माना। जब लोगों पर जेसीबी चढ़ाने की धमकी दी गई तो विधायक ने पुलिस को फोन किया। इसके बाद पुलिस ने ठेकेदार की जेसीबी और वाहन पकड़ लिए।

विधायक राजकुमार और क्षेत्रीय लोगों ने बताया कि ठेकेदार के कर्मचारी रात में लोगों के सोने के बाद खनन करते हैं। रात में जेसीबी और सात-आठ बड़े वाहन लेकर आते हैं और नदी से रेत-बजरी भरकर ले जाते हैं। बजरी को क्रेशरों पर भेजा जाता है। कुछ रेत-बजरी कहीं खाली पड़े प्लाटों पर डाल दी जाती है।

खुदाई की वजह से नदी में लगे बिजली के खंभे तिरछे हो गए हैं। इसके अलावा जेएनएनयूआरएम योजना के तहत डेढ़ करोड़ की लागत से पानी की टंकी बनी है। अगर किनारे पर रेत-बजरी की खुदाई हुई तो टंकी के नीचे पानी भर जाएगा, जिससे उसके गिरने का खतरा है। शनिवार सुबह क्षेत्रीय लोगों ने फिर हंगामा किया तो मौके पर विधायक राजकुमार, सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता एसके पाठक समेत कई अधिकारी पहुंचे। ठेकेदार के खनन नहीं करने के आश्वासन देने पर ही उसके वाहन को पुलिस ने छोड़ा।

सीएम रावत ने शुरू करवाई थी सफाई
देहरादून। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कार्यभार ग्रहण करने के बाद अधोईवाला में रिस्पना की स्थिति देखकर नदियों की सफाई के लिए कहा था। यहां नदी की गहराई कचरा पट जाने से खत्म हो गई थी। मुख्यमंत्री के कहने पर जिलाधिकारी ने सफाई का ठेका दिया था। नदियों की सफाई की मॉनीटरिंग करने के लिए सिंचाई विभाग, एमडीडीए और जिला प्रशासन के अधिकारियों की टीम गठित की थी।

उपखनिजों का अवैध भंडारण
नदियों से निकाले जा रहे उपखनिजों को कुछ मात्रा में ठेकेदार क्रेशरों पर भेज रहे हैं लेकिन अधिक मात्रा में उपखनिजों का आवासीय क्षेत्रों में भंडारण किया जा रहा है। बारिश के बाद जब नदियों में पानी भर जाएगा उपखनिजों की कालाबाजारी की जाएगी। उपखनिजों का भंडारण खाली पड़े प्लाटों और आवासीय परिसर में किया जा रहा है।

लॉस नहीं सिर्फ प्रॉफिट
नदी की सफाई का काम ठेकेदारों को नो लॉस-नो प्रॉफिट पर दिया गया था। कहा गया था कि नदियों में पड़े कचरे को साफ किया जाएगा और नदी के बीचो-बीच जमी सिल्ट को हटाया जाएगा। लेकिन ठेकेदारों ने इसकी आड़ में रेत-बजरी की खुदाई शुरू कर दी। जहां बजरी अधिक होती है वहां सात-आठ फुट गहरे तक जेसीबी से खुदाई कर दी जाती है। नदी में कचरा पड़ा रह जाता और खनन सामग्री बाहर चली जाती है। शुरुआत में ठेकेदारों ने काम ठीक किया लेकिन जैसे ही अफसर सुस्त हुए मनमानी शुरू हो गई।

रिस्पना में सफाई के नाम पर की जा रही अंधाधुंध उपखनिजों की खुदाई की शिकायत मुख्यमंत्री से की गई है। उन्हें बताया गया है कि ठेकेदार इस तरह की हरकत कर रहे हैं। – राजकुमार, क्षेत्रीय विधायक

सौजन्य से: अमर उजाला ब्यूरो

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