नई टिहरी। देवप्रयाग के बछेलीखाल में 14 करोड़ की लागत से स्वीकृत 2.4 मेगावाट की पवन ऊर्जा संयंत्र के लिए तीन साल बाद भी जमीन नहीं मिल पाई है। संयंत्र के लिए बछेलीखाल और तोली गांव के ग्रामीणों की 14.8 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जाना था, लेकिन ग्रामीण सर्किल रेट पर जमीन देने को तैयार नहीं हैं जिससे ऊर्जा संयंत्र का निर्माण शुरू नहीं हो पाया है।

वर्ष 2010 में वैज्ञानिकों ने बछेलीखाल को हवा से 2.4 मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए उपयुक्त माना था, जिसके आधार पर केंद्र सरकार ने फरवरी 2012 में पवन ऊर्जा सयंत्र स्थापित करने के लिए 14 करोड़ की धनराशि जारी की थी। इसमें राज्य सरकार को भी दस फीसदी धनराशि और देनी है। उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा अभिकरण ने पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए बछेली गांव की 3.079 और तोली की 10.32 हेक्टेयर भूमि का चयन किया था। वर्ष 2012 से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही थी। पहले ग्रामीण सर्किल रेट पर भूमि देने के लिए तैयार थे। उरेड़ा एवं राजस्व विभाग ने संबंधित जमीन को चिह्नित कर एसएलओ को भी भेज दिया था, लेकिन 2013 में नया भूमि अधिग्रहण कानून आने के चलते एसएलओ ने नए सिरे से प्रस्ताव बनाकर 70 फीसदी ग्रामीणों की सहमति मांगी है। उरेडा ने फिर से ग्रामीणों से भूमि देने के लिए सहमति बनाने की कोशिश की। बावजूद इसके ग्रामीण सर्किल रेट नहीं, बल्कि बाजारी दर पर मुआवजा की मांग कर रहे हैं जो विभाग देने को तैयार नहीं है। इस कारण ढाई साल से परियोजना का काम शुरू नहीं हो पाया है। परियोजना स्वीकृति के दौरान केंद्र सरकार ने एक साल में काम पूरा कर बिजली पैदा करने के लिए उरेडा को दिशा-निर्देश दिए थे।

बछेलीखाल में लगाया जाना था संयत्र
यहां पर 800 किलोवाट की तीन टरबाइनें, 45-45 व्यास के तीन पंखे, तीन टावर लगाए जाएंगे। एसएलओ ने नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार प्रस्ताव बनाने को कहा है। ग्रामीण सर्किल रेट पर भूमि देने को तैयार नहीं है, इस कारण दिक्कतें आ रही हैं। जल्द ग्रामीणों से एक दौर की बैठक कर सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी। – मनोज कुमार, जिला परियोजना अधिकारी उरेडा।

सौजन्य से: अमर उजाला ब्यूरो

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