चमोली जिले में 14 सालों में बंद हुए 57 प्राथमिक स्कूल
कर्णप्रयाग। राज्य बनने के बाद से चमोली जिले में अभी तक 55 प्राथमिक और दो जूनियर हाईस्कूल कम छात्र संख्या के कारण बंद हो चुके हैं। जोशीमठ ब्लाक में ही दिसंबर 2012 तक 25 और कर्णप्रयाग में 12 विद्यालयों पर ताले लटके हैं। सब बढ़े, सब पढ़ें से लेकर मिड-डे-मील आदि योजनाएं भी सरकारी स्कूलों के अस्तित्व को नहीं बचा पाई हैं।
कर्णप्रयाग के स्वर्का गांव में 13 परिवारों के 28 लोग हैं। प्राथमिक स्कूल यहां वर्ष 2010 में बंद हो चुका है, जिन ग्रामीणों के बच्चे स्कूल जाते हैं वे उन्हें तीन किमी दूर लंगासू में निजी विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। यही स्थिति श्रीतोली सहित जिले के अन्य उन गांवों की भी है, जहां प्राथमिक विद्यालय बंद हो गए हैं। र्स्वका निवासी राम प्रसाद मैखुरी और थराली के डा. रमेश पुरोहित का कहना है कि स्कूलों के बंद होने का कारण अधिकांश का सड़क से दूर होना है। गांव और स्कूलों में बिजली, पानी, संचार और स्वास्थ्य सेवाएं नहीं होने से वहां तैनात शिक्षकों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। ऐसे में सक्षम ग्रामीणों ने पाल्यों को निजी स्कूलों में भर्ती करना शुरू किया, जिससे ये विद्यालय छात्र संख्या का मानक पूरा नहीं कर पाए और बंद हो गए। निजी स्कूलों में सभी सुविधाओं के कारण भी सरकारी स्कूल बंद हुए हैं।
ब्लाक बंद हो चुके स्कूलों की संख्या
• जोशीमठ 25
• कर्णप्रयाग 12
• थराली 05
• देवाल 06
• गैरसैंण 02
• पोखरी 02
• घाट 01
• नारायणबगड़ 01
• दशोली 02
सुविधाओं की कमी बनी मुख्य कारण
छात्र संख्या पर एक नजर
जनपद में संचालित हो रहे 975 प्राथमिक विद्यालयों में 24740 बच्चे पढ़ रहे हैं, जबकि 170 अशासकीय प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या 13326 है। औसतन प्रत्येक स्कूल में 78 बच्चे हैं, जबकि जिले में 150 से अधिक सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या 10 से 30 के बीच है, जो प्रत्येक सत्र में कम हो रही है। प्राथमिक सरकारी स्कूलों के बंद होने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण पढ़ाई का नहीं होना है। शिक्षकों कहते हैं कि उन्हें अतिरिक्त कार्य सौंपे गए हैं, जबकि ऐसा नहीं है। – पुष्पा मानस, सेवानिवृत्त निदेशक विद्यालयी शिक्षा, उत्तराखंड।
सरकारी बेसिक शिक्षा के प्रति कम होता रुझान चिंताजनक है। इसका प्रमुख कारण विद्यालय स्तर पर योजनाओं का समय पर क्रियान्वयन नहीं होना है।
– हरिचंद्र सिंह रावत सीईओ चमोली (गोपेश्वर)।

Courtesy: amarujala.com
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