देहरादून। जिस माटी की कोख से ‘चिपको’ के रूप में पर्यावरण रक्षा का मंत्र देश-दुनिया में फैला अब वहीं इसकी शिद्दत से जरूरत महसूस की जा रही है। इस प्रदेश की विडंबना देखिए। पेड़ कटते जा रहे हैं और सरकारी कागजों में वन का रकबा बढ़ता जा रहा है। संरक्षित वनों और राष्ट्रीय पार्कों को छोड़ दें तो युवा पेड़ कम ही नजर आते हैं। आंकड़ों का मायाजाल देखिए कि उत्तराखंड में 2001 में जहां 23938 वर्ग किमी वन क्षेत्र था जो बढ़कर 2011 में 24446 वर्ग किमी हो गया। लेकिन बारीक फर्क यह है कि कागजों में वन भूमि का रकबा बढ़ा है, वन नहीं। ग्लेशियरों के पिघलने और पीछे हटने से छूटी जमीन पर भी वन विभाग अपना कब्जा बताता है। बताया गया है कि उत्तराखंड में दस वर्षों में एक हजार वर्ग किमी ग्लेशियर पीछे सरक गए हैं।
जीईपी लागू होता तो बदल जाता विकास का पैमाना
देहरादून। उत्तराखंड जैसे राज्यों के लिए उठा जीईपी (ग्रीन इनवायरर्मेंट प्रोडक्ट) का मुद्दा भी हाशिये पर चला गया है। इसकी अवधारणा यह थी कि किसी प्रदेश की वास्तविक विकास की स्थिति जानने के लिए जीईपी या ग्रीन जीडीपी को लागू किया जाना चाहिए। सरकार को यह भी बताना होता कि किसी विकास कार्य के चलते पर्यावरण को कितनी कीमत (आर्थिक)चुकानी पड़ी। प्रदेश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में हुए योगदान में से इस कीमत को घटाने पर कितना बचा। यही वास्तविक विकास का पैमाना होता। उत्तराखंड में यह काम फिलहाल एक विशेषज्ञ समिति के सुपुर्द होकर रह गया है। इसकी बैठकें तक नहीं हो पा रही हैं।
पर्यावरण मुद्दा नहीं
उत्तराखंड राज्य वन एवं पर्यावरण पूर्व सलाहकार अनिल बलूनी बताते हैं कि कोई भी राजनीतिक दल हो अथवा सरकार वन एवं पर्यावरण उसकी नीतियों के केंद्र में नहीं हैं। सरकार की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने पर्यावरण और वन को अलग-अलग महकमे में बांट दिया जबकि दोनों का चोली-दामन जैसा साथ है। अनिल कहते हैं बिना दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के वनों का संरक्षण नामुमकिन है।
क्षतिपूर्ति वनीकरण का लक्ष्य हासिल नहीं
1980 में पारित वन संरक्षण अधिनियम में विकास योजनाओं के लिए वन भूमि का इस्तेमाल करने वालों के लिए क्षतिपूर्ति वनीकरण (कैम्पा) को अनिवार्य बनाया गया था। लेकिन क्षतिपूर्ति वनीकरण का सिर्फ 12 फीसदी ही लक्ष्य पूरा किया जा सका है।
चिपको की शुरुआत
1970 के दशक में गढ़वाल में बिरही की भयानक बाढ़ आई थी। खतरनाक तरीके से उफनाई अलकनंदा ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। इसकी वजह की पड़ताल की गई तो पाया गया कि इलाके में बड़े पैमाने पर पेड़ काटे गए थे। चिपको आंदोलन पेड़ों की कटाई के विरोध में गौरादेवी की अगुवाई महिलाओं ने शुरू किया था जिसे बाद में चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा ने बहुत विस्तार दिया। आज के हालात काफी विकट और चुनौतीपूर्ण हैं। इसलिए अब ‘चिपको’ जैसे एक नए आंदोलन की जरूरत है।
वनों को कैसे नुकसान पहुंचता है
बिजली परियोजनाएं, सड़क, भवन और विकास संबंधी दूसरी परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर पेड़ों की बलि चढ़ाई जाती है। आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में 44868 हेक्टेयर वन भूमि को गैरवनभूमि में तब्दील किया जा चुका है। 5500 हेक्टेयर वनभूमि अकेले बिजली परियोजनाओं की भेंट चढ़ी है। इसके अलावा भवन निर्माण आदि के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं। ज्यादातर मामलों में कुछ पेड़ों की अनुमति ली जाती है और बाग के बाग साफ कर दिए जाते हैं।
वनीकरण नहीं साइन बोर्ड दिखता है
गोपेश्वर। जिले में केदारनाथ, बदरीनाथ वन्य जीव प्रभाग और अलकनंदा वन प्रभाग द्वारा वनीकरण कार्य किया जाता है। लेकिन पुरसाड़ी के समीप बदरीनाथ वन प्रभाग द्वारा वनीकरण का साइन बोर्ड तो लगाया गया है, लेकिन जमीन पर कंकरीट के सिवाय कुछ नहीं है। थराली विकास खंड के कोलपुड़ी गांव में सिंडाल और खोला तोक में वनीकरण पर करीब ढाई लाख की धनराशि खर्च की गई है। लेकिन गांव में कहीं भी वनीकरण कार्य नहीं किया गया है।
चूल्हे की आग भी दुश्मन
देहरादून। पर्वतीय क्षेत्रों के चूल्हों में हर साल 12 लाख पेड़ राख बनकर खाक हो जाते हैं। पेट की आग बुझाने को लोग जाने अनजाने पेड़ काटकर चूल्हे में जलाते हैं। मिशन ट्रू बायोलॉजिस्ट संस्था के अध्ययन में यह बात सामने आई है। वर्ष 2013 के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में तीन लाख ऐसे बीपीएल परिवार हैं, जो कि पर्वतीय क्षेत्रों में रहते हैं। प्रति परिवार 40 पेड़ का औसत निकालें तो हर साल पर्वतीय क्षेत्रों में 12 लाख पेड़ चूल्हे में खाक हो रहे हैं। मिशन ट्रू बायोलॉजिस्ट के संस्थापक डा. एमएस मेहता ‘इकोमैन’ का कहना है कि यदि इन परिवारों को सरकार साल में 12 एलपीजी सिलेंडर मुफ्त उपलब्ध करा दे तो 12 लाख पेड़ों की बलि चढ़ने से हर साल बचाई जा सकती है।
विश्व वानिकी दिवस पर विशेष
पौधों के संरक्षण में जुटे मुरारी लाल
गोपेश्वर। चमोली के पपड़ियाणा गांव के 72 वर्षीय मुरारी लाल ने अपनी जिंदगी पेड़-पौधों के संरक्षण में खपा दी। जोशीमठ ब्लॉक के रैणी गांव की महिलाओं द्वारा पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाने की कवायद आंखों देखी तो मन में पर्यावरण संरक्षण का जज्बा पैदा हुआ। उन्होंने पपड़ियाणा गांव में निजी प्रयासों से बांज का जंगल खड़ा किया जिसमें आठ सौ बांज के पेड़ हैं।
वन विभाग के परोसे आंकड़े झूठे
उत्तरकाशी। उत्तराखंड में 65 प्रतिशत वन क्षेत्र होने का भ्रम फैलाया जा रहा है। जबकि यह जंगल नहीं बल्कि जंगलात की जमीन है। वास्तविक घना जंगल तो सूबे में महज 35 प्रतिशत है। 10 प्रतिशत छितरा हुआ जंगल है। अमर उजाला से बातचीत में अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं कि यदि सरकार इस संवेदनशील क्षेत्र को आपदा से बचाना चाहती है तो यहां ऐसी प्रजाति के वनों का विकास करने की ओर ध्यान दे, जो पानी की मारक क्षमता को कम करे और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के साधन भी बनें।
अब चिपको आंदोलन को नए संदर्भों में चलाने की जरूरत है।
(गोपेश्वर से प्रमोद सेमवाल, उत्तरकाशी से सूरत सिंह रावत, देहरादून से आफताब अजमत के साथ सुधाकर भट्ट )

अमर उजाला ब्यूरो
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